गुरुवार, 22 जून 2017

मोहन कुमार कश्यप की नई पुस्तक का नाम है 'मरने से पहले'.

           मोहन कुमार कश्यप की नई पुस्तक का नाम है 'मरने से पहले'. कवि जनार्दन मिश्र के कविता संग्रह 'मरने के बाद.' विषय अलग हैं.
का नाम है
          मोहन कुमार कश्यप की कई और भी पुस्तकें हैं.जैसे 'क्यों और कैसे' ,ऐसा भी होता है, तथा 'गहरे पानी पैठ' आदि. जयपुर बुक हॉउस के प्रकाशन का नाम निरोगी दुनिया प्रकाशन है. निरोगी दुनिया इसी प्रकाशन की जानी-मानी पत्रिका है.
          'मरने से पहले'.पुस्तक  के 26 अध्यायों और 334 पृष्ठों में आत्म-हत्या के कारणों, सम्बद्ध परिवार पर पड़ने वाले प्रभावों और उससे बचने के उपायों पर सनातनी प्रकाश डालती है. सनातनी इसलिए कि लेखक स्वयं स्वीकारता है कि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अपने जीवन में जैसे कर्म करता है उसके अनुसार ही उसे फल भोगने होते हैं. उसकी मान्यता के अनुसार आत्महत्या भी एक प्रकार से जीव-हत्या ही है. अगर वह आत्म-हत्या के द्वारा शरीर का त्याग कर देता है तो उसके समस्त पुण्य निष्फल हो जाते हैं और वह घोर पाप का भगीदार बन जाता है
          इसमें पुरुषोत्तम नामक जिस व्यक्ति का ज़िक्र किया गया है उसके मृत्युपरांत के किस्सों पर सरलता से विश्वास नहीं किया जा सकता. अगर पुस्तक का दृष्टिकोण वैज्ञानिक तर्कों की कसौटी पर कसा जाता तो बेहतर होता. व्यावहारिक दृष्टि  से देखा जाये तो पाठकों को पुस्तक पढ़कर आत्म-चिंतन और आत्म-विरेचन की प्रेरणा अवश्य मिलेगी.  पुस्तक पढ़ने योग्य है.   
          पुस्तक :मरने से पहले, लेखक: मोहन कुमार कश्यप. प्रकाशक:निरोगी दुनिया, जयपुर 16  

          मूल्य; 195 .00, रुपये: वर्ष:2017 , ISBN :978-93-85151-82-8          
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शनिवार, 3 जून 2017

रंजन ज़ैदी की ग़ज़लें/ -मृणाल देवताले

रंजन ज़ैदी
रंजन ज़ैदी   की कहानियों पर अभी मैं काम कर ही रही थी कि हिंदी की सुपरिचित कवियत्री और संपादक सुश्री
ISBN : 81-86880-84-4
सफलता सरोज का श्री ज़ैदी की हिंदी-उर्दू ग़ज़लों पर एक आलेख लिखने का आदेश गया. रंजन ज़ैदी हिंदी के एक सुप्रतिष्ठित वरिष्ठ कथाकार और पत्रकार हैं. उनके व्यक्तित्व के इस पहलू पर शायद बहुत कम लिखा गया है.  

      मैंने अत्यंत व्यस्तता के रहते खुद को इस विवर से निकाल लेना ही बेहतर समझा कि तभी यू-टयूब पर एक साक्षात्कार देखने-सुनने को मिला. साक्षात्कार करने वाले थे मुंबई के जाने-माने शाइर, पत्रकार और टीवी जगत में कार्यरत निर्माता क़तील अहमद खां.

      इस साक्षात्कार में भी श्री ज़ैदी ने अपनी शाइरी पर बात की थी. इंटरव्यु के बाद मेरा इरादा बदल गया और मैंने तय किया कि मैं रचनाकार के इस पहलू पर भी काम करसकती हूँ.  इस शाइर के व्यक्त्वि कृतित्व पर अध्ययन के दौरान मुझे भी अरसे से एक बात लगातार खटक रही थी कि जिस लेखक की असंख्य कहानियां हों, आलेख हों, समीक्षाएं हों, वह अपनी काव्यात्मक सलाहियतों को परदे के पीछे क्यों रखता है? हालाँकि उसका हिंदी में कविताओं ग़ज़लों का संकलन आया भी था लेकिन शायद उसे कवि ने बुकसेलरों की दुकान तक पहुँचने नहीं दिया था. मैंने इधर तलाश भी किया तो पता चला कि अब वह आउट ऑफ़ प्रिंट है.
 
            एक कवि के रूप में उनका यह पहलू मुझे उनके व्यक्तित्व से मेल खाता नहीं लगता था. यह बात और है कि उनकी अनेक ग़ज़लें और कवितायेँ पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर पढ़ने को मिल जाती थींलेकिन अंतरंग गोष्ठियों या संगोष्ठियों में जब भी हमें उनसे उनकी नयी अप्रकाशित ग़ज़लें अशआर सुनने को मिलते तो हम सभी हतप्रभ से रह जाते थे.

      अध्ययन के दौरान पता चला कि रंजन ज़ैदी की उर्दू या हिंदी पोएट्री बचपन से ही शुरू हो गई थी. दरियागंज दिल्ली से प्रकाशित हो रहे साप्ताहिक सेवाग्राम में उनकी कवितायेँ नन्हे-मुन्ने कलाकार स्तम्भ में तब लगातार छपती रहती थी, 'बयारबेट में गोलाबारी कच्छ जो रेगिस्तान हैं, भारत के नक़्शे देखो मेरा हिन्दुतान हैं.' यह तब का गीत आज भी कवि को याद हैं. उन्होंने बातचीत के दौरान फोन पर बताया, 'मूलतः मैं शाइर ही हूँ लेकिन बहैसियत शाइर, मैं कभी अपनी मार्केटिंग नहीं कर पाया. ज़माना तो मार्केटिंग का है. हालाँकि हिंदी-उर्दू में छपा तो बहुत बार हूँ....'

           यहाँ रंजन ज़ैदी का एक शे'र याद आता हैं-
      देखा किया जो उसने बहुत देर आईना, फिर जाने क्या हुआ के वो शरमा के रह गयी.

            मुझे याद आया, उर्दू-हिंदी वेबसाईट 'ज़खीरा' के टॉप आलेखों में एक आलेख मोमिन खां मोमिन पर रंजन ज़ैदी का भी है. निश्चय ही वह एक अद्भुत और कलात्मक आलेख है. उसी में उन्होंने लिखा है कि शाइरी की सही अभिव्यक्ति उसका वास्तविक प्रस्फुटन है अनुभूति नहीं, उसकी क्रिया की कोमल प्रतिक्रिया है. वह ऐसा संवाद है जो स्वप्निल है, सुकोमल स्वप्न की यथार्थवादी परिकल्पना है.

      ऐसी  शाइरी में अक्सर देखा गया हैं कि शाइर खुद्दार भी होता हैं और दिलदार भी. ईर्ष्यालु हो तो उस सीमा तक कि अगर खुदा को शाइर का दुश्मन पसंद जाये तो वह दुश्मन को भी खुदा के हवाले सौंप सके. 'ग़ालिब' की शाइरी में ऐसा साफ देखा भी गया है. हालाँकि मोमिन अपने समकालीन शाइरों में अत्यंत ऊँचाई पर नज़र आते हैं क्योंकि उनका रंगे-तग़ज़्ज़ुल' बेहद पाक और इश्के-हक़ीक़ी से जोड़कर देखा जाता है. इसलिए उनकी ग़ज़ल की दुनिया बेहद पेचीदा और साफ-सुथरी मानी जाती है-
      मोमिन बहिश्तों-इश्क़ हक़ीक़ी तुम्हें नसीब,
        तो रंज हो  जो  ग़मे-जाविदां हो.

       जब कोई शे' आतंरिक भावना या वैयक्तिक अनुभूति पर आधारित होगा तो उसके वैश्विक विषय भी अलग  हो सकते हैं. ऐसे में उसके वाह्य प्रभावों को नकारा नहीं जा सकता. किन्तु जब शे' की बुनियाद काल्पनिक रोड़ियों से भरी हो तो उसकी ग़ज़ल के महल का अंतर्मन तो सौंदर्य   टिकाऊ होगा और ही वाह्य सौंदर्य. इसीलिए उसके सौंदर्य को जीवंतता देने के उद्देश्य से ही इसकी बुनियाद को मज़बूत किया जाता हैं. फनकारों ने इसके आतंरिक स्वभाव में रंगत पैदा की. इसमें ऐसा आत्मविश्वास पैदा किया जिसने इस विधा यानि सिंफी-ईमारत को मनो रूह बख्श दी हो. 

      यहीं से ग़ज़ल में इंक़लाब की हलचल शुरू होती नज़र आती है और रंजन ज़ैदी को इससे इतर कहना पड़ जाता है कि
                                              मैं मुट्ठियों में कभी धूप को बाँध सका,
                                              यही सवाल  कई साये  मुझसे  करते  हैं.'

      ग़ज़ल जब सवाल करने पर आई तो उसने बेबाकी से कहा-
                                              मुझे  खबर है समंदर में आके गिरते हैं,
                                              कोई है राज़ जो दरिया यहां पे मिलते हैं.' 

      आशिक़ की दीवानगी देखिये-अजीब  बात  वह  हर रात काटता है दरख्त,                                                   
                                                 सुबह  से पेड़  में  ख़ोशे  निकलने  लगते हैं..'

      इसी ग़ज़ल का मतला देखें कि--
                                               बदन में ज़ह्र मगर फिर भी सांप डसते हैं,
                                               मिरा ही घर है मेरी  आस्तीं  में रहते हैं.'

      उर्दू के शुरुआती दौर में जाएँ तो हमें मालूम होगा कि ग़ज़ल की बुनियाद में वली दखिनी की उर्दू  शाइरी का गारा लगाना शुरू कर दिया था. सिराज औरंगाबादी, दर्द, आजिज़, और शफ़ीक़ जैसे शाइर उसी जमघट की शानदार पहचान रहे है जिन्होंने ग़ज़ल में अध्यात्मवाद का रंग और भाषा को शुद्धता प्रदान की-        
                                   चली सिमते-ग़ैब से इक हवा कि चमन सुरूर का जल गया,
                                   मगर एक  शाख  निहाले-ग़म, जिसे दिल कहें, सो हरी रही.

       यहाँ ग़ज़ल के इस शे' ने लैला के सांवलाये सौंदर्य का अहसास ज़रूर किया मगरअजम' (ईरान का एक शहर)  की शीरीं के दहकते गोरे बदन ने उर्दू शाइरी को भारतीयता से वंचित कर दिया जब कि उर्दू उस हिंदुस्तान में जन्मी थी. जहाँ पद्मिनी का अद्वितीय सौंदर्य था, कृष्ण की राधिकाएँ थीं, काली दास की शकुंतला और ऋषिराज विश्वामित्र की मेनका थी जो अमीर खुसरो से लेकर जायसी के सूफीवाद तक में अपना सफर तयकर खुशबुओं की तरह रच-बस चुकी थी.

      उर्दू शाइरी के तीसरे पड़ाव पर मीर तक़ी मीर का युग शुरू हो चुका था. अशांति और विप्लव का समय था. तब तक उर्दू ग़ज़ल और शाइरी ने उस काल के  दुःख, शोक और संताप ने  रंग ही बदलकर रख दिया था  लेकिन मीर तक़ी मीर ने कहा,             
                                           'दिल वो नगर नहीं जो आबाद हो सके,
                                            बसाओगे   सुनो ये  बस्ती  उजाड़  के.'
      सौदा' ने कहा,
                                            'गुल फेंके हैं औरों  की तरफ बल्कि समर भी,
                                             ख़ाना बर अंदाज़े-चमन कुछ  तो इधर भी.'

      शाइरी के इस सफर में समय की संवेदना के वाहकों का ज़िक्र करते हुए जब मैं 1940 के सफर से आगे बढ़ती हूँ तो महसूसती हूँ कि रंजन ज़ैदी की शाइरी को समझने के लिए परम्पराओं से निकलकर हमें ग़ज़ल के उस आँगन में भी प्रवेश करना होगा जिसमें ग़ज़ल मुहब्बत और इश्क़ के लिबास उतारकर इंक़लाब के नग़मों के लिबास पहनने लगती  है . रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी ने कहा,'-
                                             शामे-ग़म कुछ निगाहे-नाज़ की बातें करो,
                                             बेखुदी बढ़ती चली है,  राज़ की बातें करो.'

      फैज़ अहमद फैज़ ने कहा-
                                           'ज़िन्दगी  हर  पल  एक  इंक़लाब है,
                                            कभी तेज़ क़दम तो कभी आहिस्ता.'.

            लेकिन आगे चलकर जैसे ही ग़ज़ल आधुनिकता की झील में उतरी, उसकी वास्तविक शक्ति और विशेषता को समझने का भ्रम मानो टूट सा गया
       नई ग़ज़ल जब अपनी नई परिभाषा के साथ नए परिवेश में प्रवेश करती है तो उसका कलेवर साफ दिखाई देने लगता है और उसके तेवर भी पहले से बदले हुए महसूस होने लगते हैं और साफ़ समझ में आने लगता है कि शाइरी मानस की भावनाओं और अनुभूतियों की ही अभिव्यक्ति है. इसके अतिरिक्त परिवेश में जो भी मनुष्य और उससे जुड़े समाज में घटक विद्यमान हैं उनके तत्व, मनुष्य के अपने द्वारा रचित संसार में अवस्थित रहते हैं. इसी जागरूकता के तहत ही  नयी उर्दू ग़ज़ल ने जन्म लेते ही अदब को यह संकेत दे दिया था कि वह प्रगतिशील ग़ज़ल या शाइरी के तमाम डिक्शन से आज़ाद होकर समाज देश में हो रहे अत्याचार, शोषण और अव्यवस्था का देश दुनिया के आतंरिक वाह्य  दोनों ही मोर्चों पर खुलकर विरोध करेगीसही मानों में यह दृष्टिकोण आज के युग की ही देन हैं . लेकिन इसके आलावा इसके आतंरिक विस्तार में पुराने और नए दोनों ही युगों का प्रतिनिधित्व भी शामिल है. जिसका दर्द शे'र में झलकता है कि-
                                            पिछली नस्लों ने जो बोया, अब तक हैं उसके असरात,
                                                   अब भी खेत में सर उगते हैं, उगते बरछी-भाले हैं.

      एक शेर और देखें--
                                            मैं पत्थर पूजता हूँ,        इसकदर हैरत से मत देखो,
                                                   मैं मिटटी हूँ तभी सिजदा किया था कुछ फ़रिश्तों ने.

      सामाजिक समरसता के बीच रहते हुए यही शाइर एक सच्चाई उगलते हुए शे' कहता है-
                                            आज मैं हूँ तो मिरे घर में सभी अपने हैं,
                                                    कल नई नस्ल मेरे आज का माज़ी होगी.
      और निर्भीकता देखें-
                                            तारीकियों में  हमने  निकाले हैं कारवां,
                                                     आँधियों हमें तो तुम्हारा भी डर नहीं.
      

       यहां तक आते-आते ग़ज़ल, अब केवल बहर (उर्दू शाइरी के व्याकरण का एक छंद) के चौखटे में रखी जाने वाली विधा होकर रह गई थी. ऐसी ग़ज़लों में अभद्रता, निर्भीकता और न समझ में आने वाले प्रतीकों के प्रयोगों से ग़ज़ल की अस्मिता और उसकी लोकप्रियता को गहरा आघात पहुंचा था. इस कुहासे में भी अरसे तक आधुनिक ग़ज़ल विरेचन की स्थिति से गुज़रती रही. दुष्यंत ने कहा-
                                                  'हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
                         कोई मुझे  अंगारों की तासीर  बताये.

      यहाँ तासीर शब्द अरबी का है जिसका अर्थ होता है प्रभाव, गुण, फल या परिणाम. यानि, उर्दू ग़ज़ल बदलते समय के साथ अब हिंदी या यूं कहें कि हिंदवी में प्रवेश करने लगी थी. हालाँकि उर्दू में कुछ इसी तरह की बात शहरयार भी कह रहे थे-
                        शह्र की सड़कों पे आखिर किसने जादू कर दिया,
                        साये  ही   साये       हैं     और   शजर  कोई नहीं.

      दुष्यंत से आगे की पीढ़ी ग़ज़ल को तो अपनाना चाहती है, ग़ालिब और दुष्यंत भी बनना चाहती है लेकिन अपने ऊपर उर्दू का ठप्पा नहीं लगाना चाहती. यह बात और है कि हिंदी की ग़ज़ल अभी तक एक भी ग़ालिब, फैज़, मजाज़ या आज के मशहूर उर्दू ग़ज़लकार को पैदा नहीं कर सकी है. जिनका शे' याद रह सके. यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषा के सिहासन से उतरकर हमें सर्व-प्रथम खुद को तमाम पूर्वाग्रहों से मुक्त करना होगा तभी हम ग़ज़ल की अस्मिता की हिफाज़त कर पाएंगे. यहां रंजन ज़ैदी का शे' शायद ही कोई भूल सके-जिसमें समाज के एक ऐसे ज़ख़्मी पहलू से उसका सामना कराया गया है जो हर घर का नासूर बनकर कोठरियों में सीलता रहता है-
                        गुज़र गई शबे-फुरक़त कि सुब्ह होती है,
                        मिरे पड़ोस  की दुल्हन अभी भी रोती है.
या ये शे'  देखें-
                        मैं बर्फ था तो पहाड़ों ने कर दिया पानी,
                        मेरी ज़मीन ज़माने  से  बोझ  सहती है.

      रंजन ज़ैदी की एक छोटी मगर सशक्त नज़्म का ज़िक्र करना यहां ज़रूरी है जो उनकी ग़ज़लों को समझने में हमारी मदद करती नज़र आएगी, जिसका शीषक है-'उदास पीपल'-
                          मेरे ख़ुलूस का पीपल बहुत उदास है आज.

                          चमकती धूप के आँचल में मुंह छुपाये हुए
                          ज़ुबाँ   है गुंग मगर कर्ब को दबाये हुए-----
                          न जाने कौन से मौसम से ख़ौफ़ खाये हुए
                          हमारी आँख की बस्ती में चुभ रहा है कोई.
                          मेरे ख़ुलूस का पीपल बहुत उदास है आज.

                          हमारी आँख की बस्ती में जो परिंदे थे--
                          न जाने कौन सी शाखों पे जाके बैठ गये
                          न जाने कौन से दरिया में जाके डूब गये
                          हमारे गीत की छागल में छुप के बैठ गये    
                          मेरे ख़ुलूस का पीपल बहुत उदास है आज
                                                             _________

      उर्दू ज़बान इसी देश की ज़बानों, बोलियों और तहज़ीबों की ही देन है. क्योंकि इंक़लाब-ज़िंदाबाद इसी देश की क्रांति के लिए उर्दू ने ही पैदा किया था. ग़ज़ल की हैसियत भी कुछ इसी तरह की है जिसका कोई बदल नहीं है. यह देश की गूंगी क्रांति का सशक्त नारा है जो इंक़लाब को रंजन ज़ैदी का शे' जन्म देता है-
                     साहिल  पे  ये  कैसा  हंगामा, तूफ़ां है    लहरों की  शोरिश,
                     डूबा वो कोई आशिक़ तो थाभूखा था या ग़म-अज़ुर्दा था.

      जैसा कि मैंने ऊपर ज़िक्र किया था कि रंजन ज़ैदी की शाइरी का एक संकलन (हिंदी में) अरावली प्रिंटर्स एंड पब्लिशर्स, नई  दिल्ली  से  2002 में प्रकाशित हुआ था (जिसकी प्रतियां अब उपलब्ध नहीं हैं, शायद प्रकाशक के पास हों), जो शाइरी पत्र-पत्रिकाओं, वेब-साइटों के माध्यम से उपलब्ध हुई है, उसके अध्ययन से पता चलता है कि उनकी शाइरी भावी संभावनाओं का बड़ा खज़ाना है. बस, हैरत इस बात की है कि रंजन ज़ैदी की ग़ज़लों पर उर्दू में अभी तक काम नहीं किया गया है जिनमें कलात्मकता का विस्तार है, चिंतन का फ़क़ीरी स्वाभाव और रचनात्मकता में संकल्प-बद्धता की उपस्थिति है  जो शाइर को उसके गद्य-साहित्य से भी बड़ा क़द प्रदान करती प्रतीत होती है. अध्ययन से यह भी पता चला कि रंजन ज़ैदी ने आधुनिकता के सैलाब में ग़ज़ल की अस्मिता और उसके प्रसार के तराज़ू को असंतुलित नहीं होने दिया है.यह अहसास ही अपने आपको नई जीवंतता प्रदान करने के लिए काफी है --
                   क़ुरआं  के  हवाले  देते  हो,  शद्दाद  के  कोड़े   सहते         हो.
                   तुम अपने मक़ासिद भूल गये, उस पर ये सियासत करते हो.

            मेरा अनुमान यह है कि रंजन ज़ैदी एक श्रेष्ठ कथाकार और पत्रकार से भी बड़े ऐसे शाइर हैं जो खास रुझान के शाइर होते हुए भी क्लासिकी शाइरी की परम्परागत संस्कृति से भली-भांति परिचित हैं और देश-काल, इतिहास, संस्कृति अपने नए विचारों-रुझानों से परिचित हैं जिसके पास उर्दू शाइरी का अपना डिक्शन है, अपनी शैली है, प्रतीक और शब्दावली है. जो उनके काव्य को ऊंचाइयों तक लेजाने में सक्षम है.

           प्रस्तुत हैं उनके कुछ अशआर---
     बरसों से है जंग  का मौसम, चीखें  आज़ह  रोज़ो-शब्, 
     एक कबूतर फिर आया है, मांगे है वह अम्न की  धूप,
     +     +      +      +      +      +      +
     मैं उसके साथ दूर बहुत दूर तक गया, 
     छोड़ा  जो  उसने  हाथ  भटक  गया. 
     कच्ची हवेलियों नेछतें खोल दीं हैं अब,
     ए आस्मां बता के कहाँ तू सरक गया.
     +     +     +     +     +   
          अखबार बन चुका है ये चेहरा मेरे अज़ीज़, 
          अहबाब मुझको पढ़के खबर जान  लेते हैं.
          +     +     +     +     +     +     +     +
          महसूस कर रहा हूँ  हवा में है कुछ  नमी,  
          शायद  मिरे  अज़ीज़  ने  आंसू  बहाये हैं.
          +      +      +      +      +      +      +      +
          शीशे का पुल है इतना तकब्बुर सही नहीं,  
          मामूली हादसा भी ये पल सह न पायेगा.
          +      +      +      +      +      +      +
          सब दरवाज़े ताले  खिड़की  टूट गए आवाज़ों से,

          सारे पागल एक जगह पर  जाने कैसे पहुँच गए.    
       
             -मृणाल देवताले __________________________________________________________________
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