تہذیبوں کا پڑاؤ- ادب کا انقلاب URL://www.facebook.com/Dayare-URDU-103457267668234/ Editor : Dr.Zuhair Ahmad Zaidi (alias RANJAN ZAIDI)
मंगलवार, 13 जनवरी 2026
जो कल था वह आज नहीं। जो कल होगा, उसका पता नहीं / डॉ. रंजन ज़ैदी ( 2 )
p> डॉ। रंजन जैदी, वरिष्ठ कथाकार, पत्रकार
बांग्ला रंग-मंच का इतिहास पुराना है, अंग्रेजों के भारत में आने से भी पहले का। पहले संस्कृत नाट्य-साहित्य काफी ऊंचाइयों पर था। बंगाल में जात्रा नामक एक संगठन हुआ करता था। अभिनय-कला को जीवित रखने की इस संस्था ने बहुत प्रयास किए। जब भारत में अंग्रेज आए तब उनके सहयोग से पहली बार औपचारिक रूप से प्ले-हाउस की स्थापना की गई। किंतु यह नाट्य-संस्था अनेक विवादों में घिरते रहने के कारण जल्द ही दम तोड़ गई। तदुपरांत १७७६ में प्ले-हाउस की पुन: औपचारिक शुरुआत हुई जिसमें पुरुष (महिलाओं के रूप में भी) अपने संस्कृत के नाटक प्रस्तुत करते और बांग्ला नाट्य-साहित्य की लोक-कथाओं पर भी नाटक तैयार करते लेकिन प्लासी के युद्ध के बाद 1774 में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अंग्रेज रेजिडेंट ने अपने संबंधित अधिकारियों तक यह बात पहुंचाई कि कलकत्ता नाट्य-गृह 'प्ले-हाउस' में कोई गिरजा घर नहीं है, इबादत के लिए ऐसे क्रिश्चियन्स को अंदर बड़े कमरे में जाना पड़ता है, जिससे दिक्कतें बढ़ जाती हैं। जब विवाद अधिक बढ़ गया तो नाट्य-गृह प्ले-हाउस को बंद कर दिया गया।
1976- न्यु प्ले-हाउस के इतिहास का उदय। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि 1788 से पहले तक कलकत्ता के विभिन्न नाट्य-मंचों पर जो अंग्रेजी के नाटक मंचित किए जाते थे वे मूलतः अंग्रेजी भाषा के होते थे और उनमें स्त्री पात्रों की भूमिकाका निर्वहन मूलतः अंग्रेज पुरुष का ही होता था। लेकिन इसके बाद यानि 1788 से प्ले-हाउस के मंच पर महिला कलाकारों का अभिनय देखने में आने लगा। इन अभिनेत्रियों की रुचि ने कलकत्ता के नाट्य-मंचों को अपनी ओर आकृष्ट किया, कुछ अखबारों ने नाटकों की समीक्षाएं छापनी शुरू कीं और गली-गलियारों की परिचर्चाओं में महिला कलाकारों का जिक्र उनकी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए काफी था। नतीजतन नाट्य-अभिनेत्रियाँ भी नाटकों में महत्वपूर्ण भूमिका में आने लगीं लेकिन मंच अभी भी अंग्रेजी भाषा का ही था। इस धारा में मोड़ तब आया जब 1789 में संस्कृत के नाटक अभिज्ञान शकुंतलम को अंग्रेजी का मंच देकर नाट्य-प्रेमी बंगालियों को चर्च के पुर्तगाली तथा यूरोपीय पादरियों ने प्रोत्साहित कर बांग्ला भाषियों को बांग्ला नाटकों के लिए एक नई ज़मीन उपलब्ध कराई जिसके उन्नायक बने बहुभाषी रूसी विद् लेबेदोफ़ और बंग भाषी नाट्यकार गोलोकनाथ दास, जिन्होंने मिलकर बांग्ला रंग-मंच को न केवल नए आयाम दिए बल्कि अनेक बांग्ला नाटक लिखकर नए नाट्य-कलाकारों को नाट्य-मंच भी उपलब्ध कराए।
लेबेदोफ़ कलकता में भारतीय भाषाओं पर अरसे से शोध-कार्य कर रहे थे। उसने ही सर्व-प्रथम दो अंग्रेजी नाटकों का बांग्ला में अनुवाद किया था। ये नाटक थे (1) डिसगाइस यानि छद्म-वेशी और (2) दूसरा, लव इज़ दी बेस्ट डॉक्टर। इनके दोनों नाटकों को बहुत पसंद किया गया। इनके गुरु गोलोक दास तो इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने लेबेदोफ़ को नाटक में काम करने की ही दावत दे दी। लेबेदोफ़ ने इस चैलेंज को स्वीकार किया और 1995 में ही उसे महिलाओं और पुरुषों को लेकर उनके शानदार अभिनय के साथ छद्म-वेश का मंचन कर दिया गया। इस नाटक को देखने के लिए दीर्घा में दर्शकों के साथ तबके (कलकत्ता के) गवर्नर जनरल भी आए थे जिन्होंने लेबेदोफ़ को बहुत प्रोत्साहित किया और पुरुस्कार से सम्मानित भी किया लेकिन पता नहीं इस सम्मान से क्यों विमुख होकर अपने शोध-कार्यों को छोड़कर गेरेसिम लेबेदोफ़ 1796 में ही अपने देश रूस लौट गया। (जारी.... 2
(2)
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Who is who
Name:Z.A.Zaidi 'Ranjan Zaidi'
Father;(Late) Dr.A.A.Zaidi; Birth; Badi,Sitapur U.P.INDIA; Journalist &; Author> Educ;M.A.Hindi,Urdu,Ph-D in Hindi; Works; Written 14 books,Participated in seminars,workshops>
Pub;six short stories collection (Hindi),Five Novel,Two Edited Books, Books for Women issues and five others book;:
Latest Books;& Hindi Novel; Released,
Film & amp; musical album (song in 15 languages.Shreya Ghoshal,Usha Utthup with others, Music; Late Adesh Srivastav, Bol; Ab humko age badhna hai…) for video,serials, documentaries & several papers/reviews/published journals/magazines/news papers>
Joint Director Media (Retired,Editor; SAMAJ KALYA, Hindi Monthly,CSWB Govt.of India;> Awards;(1985);Delhi Hindi Academy(1985-86),journalism(1991)....
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